19 जुलाई 2011
July 19, 2011 at 12:58 pm | Posted in Uncategorized | Leave a comment“इंसान जितना अपने मन को मना सके उतना खुश रह सकता है।”
04 जुलाई 2011
July 4, 2011 at 5:29 am | Posted in आज का विचार | 2 Commentsइतने मधुर न हों कि लोग आपको निगल लें, और इतने कटु भी नहीं कि वे आपको उगल दें।
16 june 2011
June 16, 2011 at 5:46 am | Posted in Uncategorized | Leave a commentअपनी भूल को स्वीकार करने में जो गौरव है, वह अन्याय को चिरायु रखने में नहीं।
2 जून 2011
June 2, 2011 at 8:42 am | Posted in आज का विचार | Leave a commentजोखिम का परिणाम भुगतना उतना कठिन नहीं होता जितना जोखिम उठाना।
तो रोना आता है…
March 11, 2011 at 12:15 pm | Posted in कविता | Leave a commentआँसू को कमजोरी की निशानी है माना मगर
गम जब हद से गुजरने लगे तो रोना आता है
अँधेरों से लड़ने की ताकत है मुझमें मगर
दिन जब रात से लंबा लगे तो रोना आता है
हर दरिया तैर कर निकल जाएँगे ये गुरूर अच्छा है मगर
जिस्म जब रूह से हारने लगे तो रोना आता है
अपनी किस्मत पर इठलाना अच्छा लगता है मगर
दिमाग जब दिल से हारने लगे तो रोना आता है
यादों की दस्तक से कौन खुद को बचा पाया है मगर
कभी फलक सितारों से खाली लगे तो रोना आता है
मेरे दोस्तों का जिगर बहुत बड़ा है मगर
खुद से माफी न मिले तो रोना आता है
इस दुनिया में हाथ मिलाने वाले बहुत हैं
किसी से दिल ना मिले तो रोना आता है…
- अरुंधती अमड़ेकर
11 मार्च 2011
March 11, 2011 at 12:13 pm | Posted in आज का विचार | Leave a commentवास्तविक महानता की उत्पत्ति स्वयं पर खामोश विजय से होती है।
तो रोना आता है…
February 25, 2011 at 12:51 pm | Posted in कविता | 1 Commentआँसू कमजोरी की निशानी है माना मगर
गम जब हद से गुजरने लगे तो रोना आता है
अँधेरों से लड़ने की ताकत है मुझमें मगर
दिन जब रात से लंबा लगे तो रोना आता है
हर दरिया तैर कर निकल जाएँगे ये गुरूर अच्छा है मगर
जिस्म जब रूह से हारने लगे तो रोना आता है
अपनी किस्मत पर इठलाना अच्छा लगता है मगर
दिमाग जब दिल से हारने लगे तो रोना आता है
यादों की दस्तक से कौन खुद को बचा पाया है मगर
कभी फलक सितारों से खाली लगे तो रोना आता है
मेरे दोस्तों का जिगर बहुत बड़ा है मगर
खुद से माफी न मिले तो रोना आता है
इस दुनिया में हाथ मिलाने वाले बहुत हैं
किसी से दिल ना मिले तो रोना आता है…
- अरुंधती अमड़ेकर
कुछ अजीब…………
March 20, 2008 at 1:57 pm | Posted in कविता | 3 Commentsअपनी परछाई को अपने अंदर देखना चाहती हूँ
शून्य की हर सीमा को लांघना चाहती हूँ
हर दिन को रात से शुरू करना चाहती हूँ
पता नहीं क्यों, पर मैं कुछ अजीब करना चाहती हूँ
जीती हुई हर बाज़ी हारना चाहती हूँ
सब कुछ पाकर फिर से खोना चाहती हूँ
शायद हर एहसास को मिटाना चाहती हूँ
पता नहीं क्यों, पर मैं कुछ अजीब करना चाहती हूँ
हर अंत को प्रारंभ करना चाहती हूँ
और हर आरंभ पर पराभव चाहती हूँ
शायद उसे अपनी नियति बनाना चाहती हूँ
पता नहीं क्यों, पर मैं कुछ अजीब करना चाहती हूँ
सब कुछ तोड़कर स्वयं को जोड़ना चाहती हूँ
और फिर से टूटकर बिखरना चाहती हूँ
शायद उन टुकड़ों से सिर्फ़ ख़ुद को चुनना चाहती हूँ
पता नहीं क्यों, पर मैं कुछ अजीब करना चाहती हूँ
————————- अरुंधती आमड़ेकर
लोग कहते हैं कि….
January 12, 2008 at 8:44 am | Posted in कविता | 11 Commentsज़िंदगी और कुछ नहीं बस मौत तक पहुँचने का एक ज़रिया है,
क्या करूँ मैं कि उसे देखने का मेरा यही नज़रिया है।
अक्सर मुझे लोगों के मातम पर हँसी और जश्न पर रोना आया,
और लोग कहते हैं कि मुझे जीने का सलीका नहीं आया।
मौत से डर-डर कर मुझे जीना नहीं आता,
और लोग कहते हैं मुझे रास्ता पार करना नहीं आता।
चिकनी ज़मीन पर अब तक फिसलती रही हूँ मैं,
और लोग कहते हैं मुझे चलना नहीं आता।
फिसलनें कभी सोचने का मौका नहीं देती,
और लोग कहते हैं मुझे सँभलना नहीं आता।
अपने में गुम, दुनियादारी से वास्ता नहीं मेरा,
और लोग कहते हैं मुझे बरतना नहीं आता।
हर माहौल न जाने क्यूँ मुझे पहेली सा लगता है
और लोग कहते हैं मुझे समझना नहीं आता।
बस कभी-कभी ज़बान साथ नहीं देती मेरा,
और लोग कहते हैं मुझे बोलना नहीं आता।
मैं हमेशा पत्थरों में ईंटें खोजती रही,
और लोग कहते हैं मुझे जवाब देना नहीं आता।
मैंने आँसूओं को अपनी आँखों में पनाह दी है,
और लोग कहते हैं मुझे रोना नहीं आता।
————————————-X—————————————————–
ये दुनिया मुझे कभी अपनी नहीं लगती,
और लोग कहते हैं कि मग़रूर हूँ मैं।
ख़ुद को दिए ज़ख़्मों से घायल हूँ मैं,
और लोग कहते हैं कि पागल हूँ मैं।
मेरी आँखें हर वक्त ज़िदगी तलाशती हैं,
और लोग कहते हैं कि ज़िंदा हूँ मैं।
अपने से हारी हुई एक ख़ामोश हमलावर हूँ मैं,
और लोग कहते हैं कि जानवर हूँ मैं।
एक बर्खास्त, बेदखल सोच की बिरादर हूँ मैं,
और लोग कहते हैं कि जानवर हूँ मैं।
नज़र, आवाज़ और लफ़्ज़ों के हर दायरे से बाहर हूँ मैं,
और लोग कहते हैं कि जानवर हूँ मैं
जानवर हूँ मैं…
जानवर हूँ मैं…
जानवर हूँ मैं…
—अरुंधती अमड़ेकर
26 दिसंबर 2007
December 26, 2007 at 5:18 am | Posted in आज का विचार | 3 Commentsदूसरों में आदर्श ढूँढना वक्त की बर्बादी करना है।
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