आग़ाज़

May 27, 2007 at 12:52 pm | In कवि‍ता | 8 Comments

मत काटो रोकर इसे, ये पल में फ़ना हो जाएगी,
मौत फिर भी अच्‍छी होगी, ज़िंदगी बदतर हो जाएगी

है अफ़सोस ज़िंदगी का तो मौत कहीं अच्‍छी है
कांटों को भी तोहफ़ा समझे वही ज़िंदगी सच्‍ची है
मुश्‍किलों से डरने वाले कभी परवान नहीं चढ़ते
ज़िंदगी से हारने वाले जंग का एलान नहीं करते

दिलजले आंखों में ज़लज़ले लेकर जीते हैं
जज़्बातों के सैलाब को फ़र्ज में घोलकर पीते हैं
रिश्‍तों के दरिया से कोई मौज न इधर आएगी
जंग के इस तन्‍हा सफ़र में तन्‍हाई साथ निभाएगी

आगाज़ जो करते हैं वो अकेले ही निकल जाते हैं
मुड़कर कभी देखते नहीं, पीछे कई कांरवां साथ आते हैं
मंज़िल तक पहुंचे नहीं तो क्‍या चिंगारी सुलगा जाते हैं
फिर ये शोलों के बवंडर जंग फ़तेह कर लाते हैं

तब जो मौत होती है वो तारीख़ों में कैद हो जाती है
स्‍याही भी जिसकी ख़ुद पर गुरबत से बड़ी इठलाती है
वो तारीख की रूह जन्‍नत में पनाह हो जाएगी
मत काटो रोकर इसे ये पल में फ़ना हो जाएगी

                                                    अरुंधती अमड़ेकर (शिवानी)

8 Comments »

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  1. यह कवित नही वाकई एक आगाज है और जो शब्द “मत काटो इसे रोकर” का प्रयोग इतना Symbolic लगा कि पूरी कविता धार बन गई… ज्वाला और अभिज्ञान का परम संयोग …बस झुम गया…।

  2. बहुत बढ़िया ! किन्तु क्या यह संभव नहीं कि उर्दु शब्दों के हिन्दी में अर्थ दिये जाएँ ?
    धन्यवाद ।
    घुघूती बासूती

  3. अच्छा लगा पढ़कर ….बधाई

  4. “है अफ़सोस ज़िंदगी का तो मौत कहीं अच्‍छी है
    कांटों को भी तोहफ़ा समझे वही ज़िंदगी सच्‍ची ह”
    आगाज़ में इतनी निराशा क्यों भाई ? लेकिन फिर भी आगाज़ अच्छा बन पड़ा है , बधाई

  5. आगाज़ जो करते हैं वो अकेले ही निकल जाते हैं
    मुड़कर कभी देखते नहीं, पीछे कई कांरवां साथ आते हैं
    मंज़िल तक पहुंचे नहीं तो क्‍या चिंगारी सुलगा जाते हैं
    फिर ये शोलों के बवंडर जंग फ़तेह कर लाते हैं

    बिलकुल आगाज़ ही ऐसा है कि वाकई पीछे कई कारवां साथ आएँगे।

  6. @divyabh ji,
    bahut bahut shukriya.

  7. @ ghughutibasuti ji,
    आपका सुझाव अच्‍छा है, आप चाहें तो मैं शब्‍द विशेष का अर्थ बता दूंगी. टिप्‍पणी के लिए धन्‍यवाद।

  8. धन्‍यवाद रीतेश जी!!!


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