बहुत दिनों बाद…
October 25, 2007 at 8:52 am | In कविता | 4 Commentsकुछ लिखने का मन किया है
आज बहुत दिनों बाद।
मन किया है, नहीं नहीं….
शायद ज़ख्मों का दर्द हरा है
आज बहुत दिनों बाद।
ज़ख्मों का दर्द, नहीं नहीं….
शायद ख़ुद से बात हुई है
आज बहुत दिनों बाद।
ख़ुद से बात? हाँ हुई है,
शायद मेरा वक्त हुआ है साथ
आज बहुत दिनों बाद।
न लिख पाने की मजबूरी में तो
रोज़ रोता था मेरा मन,
खाली पन्नों पर रोईं हैं आँखें
आज बहुत दिनों बाद।
मन भी वही है, ज़ख्म भी वही हैं
दर्द भी है वही,
शायद शब्दों ने साथ दिया है
आज बहुत दिनो बाद।
मैं भी वही हूँ, मेरी मजबूरी वही है
और हैं खाली पन्ने भी वही
शायद कलम ने साथ दिया है
आज बहुत दिनों बाद…..
4 Comments »
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सही किया-लिखने का मन किया तो लिखा-हमारा भी पढ़ने के बाद टिपियाने का मन कर रहा है तो टिपियाया. और लिखिये.
Comment by समीर लाल — October 25, 2007 #
वाह… वाह… बेहतरीन कविता…
खाली पन्नों पर टपकते अश्रु से ही तो उभरे हैं ऐसे अद्भुत अक्षर…।
क्या कहा जाए… बहुत अच्छा।
Comment by divyabh — October 25, 2007 #
और हाँ मन ने भी दिया साथ
बहुत दिनो बाद
Comment by संजय पटेल — October 25, 2007 #
ठीक है जब मन हो तब लिखो।
Comment by अतुल शर्मा — November 3, 2007 #