लोग कहते हैं कि….
January 12, 2008 at 8:44 am | Posted in कविता | 11 Commentsज़िंदगी और कुछ नहीं बस मौत तक पहुँचने का एक ज़रिया है,
क्या करूँ मैं कि उसे देखने का मेरा यही नज़रिया है।
अक्सर मुझे लोगों के मातम पर हँसी और जश्न पर रोना आया,
और लोग कहते हैं कि मुझे जीने का सलीका नहीं आया।
मौत से डर-डर कर मुझे जीना नहीं आता,
और लोग कहते हैं मुझे रास्ता पार करना नहीं आता।
चिकनी ज़मीन पर अब तक फिसलती रही हूँ मैं,
और लोग कहते हैं मुझे चलना नहीं आता।
फिसलनें कभी सोचने का मौका नहीं देती,
और लोग कहते हैं मुझे सँभलना नहीं आता।
अपने में गुम, दुनियादारी से वास्ता नहीं मेरा,
और लोग कहते हैं मुझे बरतना नहीं आता।
हर माहौल न जाने क्यूँ मुझे पहेली सा लगता है
और लोग कहते हैं मुझे समझना नहीं आता।
बस कभी-कभी ज़बान साथ नहीं देती मेरा,
और लोग कहते हैं मुझे बोलना नहीं आता।
मैं हमेशा पत्थरों में ईंटें खोजती रही,
और लोग कहते हैं मुझे जवाब देना नहीं आता।
मैंने आँसूओं को अपनी आँखों में पनाह दी है,
और लोग कहते हैं मुझे रोना नहीं आता।
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ये दुनिया मुझे कभी अपनी नहीं लगती,
और लोग कहते हैं कि मग़रूर हूँ मैं।
ख़ुद को दिए ज़ख़्मों से घायल हूँ मैं,
और लोग कहते हैं कि पागल हूँ मैं।
मेरी आँखें हर वक्त ज़िदगी तलाशती हैं,
और लोग कहते हैं कि ज़िंदा हूँ मैं।
अपने से हारी हुई एक ख़ामोश हमलावर हूँ मैं,
और लोग कहते हैं कि जानवर हूँ मैं।
एक बर्खास्त, बेदखल सोच की बिरादर हूँ मैं,
और लोग कहते हैं कि जानवर हूँ मैं।
नज़र, आवाज़ और लफ़्ज़ों के हर दायरे से बाहर हूँ मैं,
और लोग कहते हैं कि जानवर हूँ मैं
जानवर हूँ मैं…
जानवर हूँ मैं…
जानवर हूँ मैं…
—अरुंधती अमड़ेकर
11 Comments »
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Entries and comments feeds.
अपने मनोभावों को बखूबी अभिव्यक्त किया है।जिन्दगी को देखने का सभी का अपना अपना नजरिया होता है।बढिया लिखा है।
Comment by paramjitbali— January 12, 2008 #
अच्छी भाव अभिव्यक्ति है.
शब्दों का सुंदर चित्रण किया आपने.
पढ़ आनंद की प्राप्ति हुई है.
आपको बधाई.
Comment by balkishan— January 12, 2008 #
अरूंधति, आज ४ साल पूरे होने पर पिछली पोस्ट देख रहा था तो आपकी टिप्पणी नजर आयी वहीं से यहाँ आ पहुँचा।, कविता अच्छी लिखी है खासकर बर्खास्त बेदखल वाली लाईन।
कैसी हैं आप ?
Comment by Tarun— February 15, 2008 #
बढ़िया है
जारी रहे
Comment by अतुल शर्मा— February 22, 2008 #
जिंदगी एक पैमाना है जो भर के शलक जाता है
Comment by Mannna— April 19, 2011 #
अच्छी भाव अभिव्यक्ति है.
बढिया लिखा है।
GOOD
Comment by RAVI SETHIYA— May 5, 2011 #
Kaya Baat Hai, Kamal hai.
Best Regards
Comment by Kailash Goyal— May 23, 2011 #
Kaya Baat Hai, Kamal hai.
Best Regards
Comment by Ashok— May 31, 2011 #
अति सुंदर, बहुत बढ़िया. जिंदगी को सच में समझने की जरूरत है।
Comment by Amrish Kumar— July 18, 2011 #
Thanks, Amrish!!
Comment by arundhati— July 18, 2011 #
bhaut kuch hai batane ko pee koye gu natahi nahi
Comment by babitaRani— September 7, 2011 #