कुछ अजीब…………

March 20, 2008 at 1:57 pm | In कवि‍ता | 1 Comment

अपनी परछाई को अपने अंदर देखना चाहती हूँ
शून्‍य की हर सीमा को लांघना चाहती हूँ
हर दिन को रात से शुरू करना चाहती हूँ
पता नहीं क्‍यों, पर मैं कुछ अजीब करना चाहती हूँ

जीती हुई हर बाज़ी हारना चाहती हूँ
सब कुछ पाकर फिर से खोना चाहती हूँ
शायद हर एहसास को मिटाना चाहती हूँ
पता नहीं क्‍यों, पर मैं कुछ अजीब करना चाहती हूँ

हर अंत को प्रारंभ करना चाहती हूँ
और हर आरंभ पर पराभव चाहती हूँ
शायद उसे अपनी नियति बनाना चाहती हूँ
पता नहीं क्‍यों, पर मैं कुछ अजीब करना चाहती हूँ

सब कुछ तोड़कर स्‍वयं को जोड़ना चाहती हूँ
और फिर से टूटकर बिखरना चाहती हूँ
शायद उन टुकड़ों से सिर्फ़ ख़ुद को चुनना चाहती हूँ
पता नहीं क्‍यों, पर मैं कुछ अजीब करना चाहती हूँ

————————- अरुंधती आमड़ेकर

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