कुछ अजीब…………

March 20, 2008 at 1:57 pm | In कवि‍ता | 1 Comment

अपनी परछाई को अपने अंदर देखना चाहती हूँ
शून्‍य की हर सीमा को लांघना चाहती हूँ
हर दिन को रात से शुरू करना चाहती हूँ
पता नहीं क्‍यों, पर मैं कुछ अजीब करना चाहती हूँ

जीती हुई हर बाज़ी हारना चाहती हूँ
सब कुछ पाकर फिर से खोना चाहती हूँ
शायद हर एहसास को मिटाना चाहती हूँ
पता नहीं क्‍यों, पर मैं कुछ अजीब करना चाहती हूँ

हर अंत को प्रारंभ करना चाहती हूँ
और हर आरंभ पर पराभव चाहती हूँ
शायद उसे अपनी नियति बनाना चाहती हूँ
पता नहीं क्‍यों, पर मैं कुछ अजीब करना चाहती हूँ

सब कुछ तोड़कर स्‍वयं को जोड़ना चाहती हूँ
और फिर से टूटकर बिखरना चाहती हूँ
शायद उन टुकड़ों से सिर्फ़ ख़ुद को चुनना चाहती हूँ
पता नहीं क्‍यों, पर मैं कुछ अजीब करना चाहती हूँ

————————- अरुंधती आमड़ेकर

लोग कहते हैं कि….

January 12, 2008 at 8:44 am | In कवि‍ता | 4 Comments

ज़िंदगी और कुछ नहीं बस मौत तक पहुँचने का एक ज़रिया है,
क्‍या करूँ मैं कि उसे देखने का मेरा यही नज़रिया है।

अक्‍सर मुझे लोगों के मातम पर हँसी और जश्न पर रोना आया,
और लोग कहते हैं कि मुझे जीने का सलीका नहीं आया।

मौत से डर-डर कर मुझे जीना नहीं आता,
और लोग कहते हैं मुझे रास्‍ता पार करना नहीं आता।

चिकनी ज़मीन पर अब तक फिसलती रही हूँ मैं,
और लोग कहते हैं मुझे चलना नहीं आता।

फिसलनें कभी सोचने का मौका नहीं देती,
और लोग कहते हैं मुझे सँभलना नहीं आता।

अपने में गुम, दुनियादारी से वास्‍ता नहीं मेरा,
और लोग कहते हैं मुझे बरतना नहीं आता।

हर माहौल न जाने क्‍यूँ मुझे पहेली सा लगता है
और लोग कहते हैं मुझे समझना नहीं आता।

बस कभी-कभी ज़बान साथ नहीं देती मेरा,
और लोग कहते हैं मुझे बोलना नहीं आता।

मैं हमेशा पत्‍थरों में ईंटें खोजती रही,
और लोग कहते हैं मुझे जवाब देना नहीं आता।

मैंने आँसूओं को अपनी आँखों में पनाह दी है,
और लोग कहते हैं मुझे रोना नहीं आता।

————————————-X—————————————————–

ये दुनिया मुझे कभी अपनी नहीं लगती,
और लोग कहते हैं कि मग़रूर हूँ मैं।

ख़ुद को दिए ज़ख़्मों से घायल हूँ मैं,
और लोग कहते हैं कि पागल हूँ मैं।

मेरी आँखें हर वक्त ज़िदगी तलाशती हैं,
और लोग कहते हैं कि ज़िंदा हूँ मैं।

अपने से हारी हुई एक ख़ामोश हमलावर हूँ मैं,
और लोग कहते हैं कि जानवर हूँ मैं।

एक बर्खास्‍त, बेदखल सोच की बिरादर हूँ मैं,
और लोग कहते हैं कि जानवर हूँ मैं।

नज़र, आवाज़ और लफ़्ज़ों के हर दायरे से बाहर हूँ मैं,
और लोग कहते हैं कि जानवर हूँ मैं

जानवर हूँ मैं…

जानवर हूँ मैं…

जानवर हूँ मैं…

 —अरुंधती अमड़ेकर

बहुत दिनों बाद…

October 25, 2007 at 8:52 am | In कवि‍ता | 4 Comments

कुछ लिखने का मन किया है
आज बहुत दिनों बाद।

मन किया है, नहीं नहीं….
शायद ज़ख्‍मों का दर्द हरा है
आज बहुत दिनों बाद।

ज़ख्‍मों का दर्द, नहीं नहीं….
शायद ख़ुद से बात हुई है
आज बहुत दिनों बाद।

ख़ुद से बात? हाँ हुई है,
शायद मेरा वक्त हुआ है साथ
आज बहुत दिनों बाद।

न लिख पाने की मजबूरी में तो
रोज़ रोता था मेरा मन,
खाली पन्‍नों पर रोईं हैं आँखें
आज बहुत दिनों बाद।

मन भी वही है, ज़ख्‍म भी वही हैं
दर्द भी है वही,
शायद शब्‍दों ने साथ दिया है
आज बहुत दिनो बाद।

मैं भी वही हूँ, मेरी मजबूरी वही है
और हैं खाली पन्‍ने भी वही
शायद कलम ने साथ दिया है
आज बहुत दिनों बाद…..

आग़ाज़

May 27, 2007 at 12:52 pm | In कवि‍ता | 8 Comments

मत काटो रोकर इसे, ये पल में फ़ना हो जाएगी,
मौत फिर भी अच्‍छी होगी, ज़िंदगी बदतर हो जाएगी

है अफ़सोस ज़िंदगी का तो मौत कहीं अच्‍छी है
कांटों को भी तोहफ़ा समझे वही ज़िंदगी सच्‍ची है
मुश्‍किलों से डरने वाले कभी परवान नहीं चढ़ते
ज़िंदगी से हारने वाले जंग का एलान नहीं करते

दिलजले आंखों में ज़लज़ले लेकर जीते हैं
जज़्बातों के सैलाब को फ़र्ज में घोलकर पीते हैं
रिश्‍तों के दरिया से कोई मौज न इधर आएगी
जंग के इस तन्‍हा सफ़र में तन्‍हाई साथ निभाएगी

आगाज़ जो करते हैं वो अकेले ही निकल जाते हैं
मुड़कर कभी देखते नहीं, पीछे कई कांरवां साथ आते हैं
मंज़िल तक पहुंचे नहीं तो क्‍या चिंगारी सुलगा जाते हैं
फिर ये शोलों के बवंडर जंग फ़तेह कर लाते हैं

तब जो मौत होती है वो तारीख़ों में कैद हो जाती है
स्‍याही भी जिसकी ख़ुद पर गुरबत से बड़ी इठलाती है
वो तारीख की रूह जन्‍नत में पनाह हो जाएगी
मत काटो रोकर इसे ये पल में फ़ना हो जाएगी

                                                    अरुंधती अमड़ेकर (शिवानी)

माँ

April 2, 2007 at 5:07 am | In कवि‍ता | 3 Comments

संबंध नहीं हैं माँ केवल संपर्क नहीं है
आदर्श है जीवन का केवल संबोधन नहीं है

जन्‍मदात्री है वो मात्र सहवास नहीं है
व्‍यक्तित्‍व की निर्मात्री है केवल व्‍यक्‍ति का आभास नहीं है

ममता की प्रतिमा है केवल नारी का एक रूप नहीं है
स्‍नेह की छाया है केवल कठोरता की धूप नहीं है

हृदय है इसका प्रेम का सागर, जिसकी कोई थाह नहीं है
आघातों से पीड़ित है फिर भी मुख पर आह नहीं है

आघात जो मिले है अपनो से सहने के अतिरिक्त राह नहीं है
दंडित करने की अधिकारी है मात्र क्षमा का प्रवाह नहीं है

कृतघ्न हैं वो जो माता को आहत करते हैं
कर्तव्‍यों से मुँह मोड़ अधिकारों का दावा करते हैं

संतान के रक्षण हेतु माता न जाने क्‍या क्‍या करती है
पीड़ाओं को सहकर भी आँचल की छाया देती है

कभी देवकी बनकर वो निरपराध ही दंड भोगती है
कभी अग्नि में पश्चाताप की कैकयी सी बन जलती है

सुपुत्रों से आज है मेरा नम्र निवेदन
दु:ख भी न दें उसे, यदि दे न सके सुख का आश्वासन

                                                         - अरुंधती अमड़ेकर (शिवानी)

न जानने के लि‍ए…..

January 20, 2007 at 11:59 am | In कवि‍ता | 6 Comments

मैं देखती हूँ
हर रोज़ उगते हुए सूरज को
जैसे बैचेन हो वो अँधेरा मि‍टाने के लि‍ए
कल इसी सूरज ने ढलते वक़्त कहा था,
मैं कल फि‍र आऊँगा तुम न भी बुलाओ तो भी,
कल भी कहाँ बुलाया था तुमने,
फि‍र भी देखो मैं आया हूँ
और मैं नि‍:स्‍तब्‍ध देखती रहती हूँ
सच है, कैसे रोक सकती हूँ मैं उसके आने
और नि‍श्चि‍त ही उसके जाने को भी

मैं देखती हूँ
हर रोज़ रात गहरे आकाश में,
टि‍मटि‍माते तारों को
जैसे वे कुछ कहना चाहते हों मुझसे
जो ज़रूरी है जीने के लि‍ए और
खुश रहने के लि‍ए भी
ऐसा कुछ जो जानती हूँ मैं
लेकि‍न समझना नहीं चाहती
या ऐसा कुछ जो
समझती हूँ मैं लेकि‍न जानना नहीं चाहती,

मैं देखती हूँ
हर रोज़ यही सब कुछ
सूरज का आना और जाना,
तारों का टि‍मटि‍माना और मुझे समझाना,
फि‍र भी मुझे ये सब,
नया लगता है,
शायद इसलि‍ए कि‍ हर दि‍न
हमारी बाकी बची ज़िंदगी का
पहला दि‍न होता है….
                                

                                                             अरुंधती अमड़ेकर (शि‍वानी)

नींद में………

January 11, 2007 at 5:14 am | In कवि‍ता | 3 Comments

कि‍तनी अच्‍छी होती है ये नींद,

इसकी गि‍रफ़्त में,

न हम, हम रहते हैं, न आप, आप,

भूल जाते हैं,

हम कौन हैं, क्‍या हैं, और क्‍यों हैं?

इसकी गि‍रफ़्त में,

न डर मौत का

न फ़ि‍क्र ज़िंदगी की,

न उलझने रास्‍तों की

और न अफ़सोस

मंज़ि‍ल तक न पहुँच पाने का,

 

भूल जाते हैं

सब कुछ, इसकी गि‍रफ़्त में,

दुश्‍मनी कि‍सी दोस्‍त की,

दोस्‍ती कि‍सी दुश्‍मन की

 

भूल जाते हैं,

दर्द, खुशी, ग़म, ज़ज़्बात, रि‍श्‍ते

और इनके जैसे कई शब्‍द जो ज़िंदगी को

जोड़ते हैं, तोड़ते हैं,

सँवारते हैं, बि‍खेरते हैं,

 

भूल जाते हैं,

इसकी गि‍रफ़्त में,

जागती आँखों से देखे सपनों को,

भूल जाते हैं

उन्‍हें पूरा करने के बोझ को,

और खो जाते हैं उन अजनबी सपनों में,

जि‍नका बरसों से कोई नाता ही नहीं रहा हमसे

फ़ि‍र भी मजबूर हैं हम,

इन्‍हें देखने और इनमें खोने के लि‍ए

इतना ही नहीं, मजबूर हैं हम

जागने और फ़ि‍र से हक़ीकत में आने के लि‍ए भी,

क्‍योंकि‍, सपने जहाँ ख़त्‍म होते हैं, हक़ीकत वहाँ से शुरू होती है,

और नींद जहाँ पर ख़त्‍म होती है, सुबह वहीं से शुरू होती है……

                                                     

 — अरुंधती अमड़ेकर  (शि‍वानी)

Blog at WordPress.com. | Theme: Pool by Borja Fernandez.
Entries and comments feeds.