18 अगस्‍त 2007

August 18, 2007 at 5:45 am | In आज का विचार | 3 Comments

जीवन एक लंबी और असाध्‍य बीमारी की तरह है।

आग़ाज़

May 27, 2007 at 12:52 pm | In कवि‍ता | 8 Comments

मत काटो रोकर इसे, ये पल में फ़ना हो जाएगी,
मौत फिर भी अच्‍छी होगी, ज़िंदगी बदतर हो जाएगी

है अफ़सोस ज़िंदगी का तो मौत कहीं अच्‍छी है
कांटों को भी तोहफ़ा समझे वही ज़िंदगी सच्‍ची है
मुश्‍किलों से डरने वाले कभी परवान नहीं चढ़ते
ज़िंदगी से हारने वाले जंग का एलान नहीं करते

दिलजले आंखों में ज़लज़ले लेकर जीते हैं
जज़्बातों के सैलाब को फ़र्ज में घोलकर पीते हैं
रिश्‍तों के दरिया से कोई मौज न इधर आएगी
जंग के इस तन्‍हा सफ़र में तन्‍हाई साथ निभाएगी

आगाज़ जो करते हैं वो अकेले ही निकल जाते हैं
मुड़कर कभी देखते नहीं, पीछे कई कांरवां साथ आते हैं
मंज़िल तक पहुंचे नहीं तो क्‍या चिंगारी सुलगा जाते हैं
फिर ये शोलों के बवंडर जंग फ़तेह कर लाते हैं

तब जो मौत होती है वो तारीख़ों में कैद हो जाती है
स्‍याही भी जिसकी ख़ुद पर गुरबत से बड़ी इठलाती है
वो तारीख की रूह जन्‍नत में पनाह हो जाएगी
मत काटो रोकर इसे ये पल में फ़ना हो जाएगी

                                                    अरुंधती अमड़ेकर (शिवानी)

माँ

April 2, 2007 at 5:07 am | In कवि‍ता | 3 Comments

संबंध नहीं हैं माँ केवल संपर्क नहीं है
आदर्श है जीवन का केवल संबोधन नहीं है

जन्‍मदात्री है वो मात्र सहवास नहीं है
व्‍यक्तित्‍व की निर्मात्री है केवल व्‍यक्‍ति का आभास नहीं है

ममता की प्रतिमा है केवल नारी का एक रूप नहीं है
स्‍नेह की छाया है केवल कठोरता की धूप नहीं है

हृदय है इसका प्रेम का सागर, जिसकी कोई थाह नहीं है
आघातों से पीड़ित है फिर भी मुख पर आह नहीं है

आघात जो मिले है अपनो से सहने के अतिरिक्त राह नहीं है
दंडित करने की अधिकारी है मात्र क्षमा का प्रवाह नहीं है

कृतघ्न हैं वो जो माता को आहत करते हैं
कर्तव्‍यों से मुँह मोड़ अधिकारों का दावा करते हैं

संतान के रक्षण हेतु माता न जाने क्‍या क्‍या करती है
पीड़ाओं को सहकर भी आँचल की छाया देती है

कभी देवकी बनकर वो निरपराध ही दंड भोगती है
कभी अग्नि में पश्चाताप की कैकयी सी बन जलती है

सुपुत्रों से आज है मेरा नम्र निवेदन
दु:ख भी न दें उसे, यदि दे न सके सुख का आश्वासन

                                                         - अरुंधती अमड़ेकर (शिवानी)

शि‍ल्‍पा द बि‍ग सि‍स्‍टर

January 30, 2007 at 9:00 am | In चर्चा में | 5 Comments

शि‍ल्‍पा को ब्रि‍टेन के रि‍यलि‍टी शो में जीतने पर बधाई। शि‍ल्‍पा ने भले ही इस शो में कि‍सी नि‍जी स्‍वार्थ से प्रेरि‍त होकर भाग लि‍या हो लेकि‍न अनायास ही वो एक ऐसे पहलू को उजागर करने का नि‍मि‍त्त बनी जो पूरे वि‍श्व के सामने यक्ष प्रश्न है. इस घटना ने दक्षि‍ण अफ़्रीका में हुए गांधीजी के अपमान के ज़ख्‍म को जैसे हरा हो गया हो. यह घटना इस बात का सबूत है कि‍ नस्‍लवाद आज भी कहीं न कहीं पश्चि‍मि‍यों के ज़हन में है. भले ही वो इसे आज खुलकर बयाँ नहीं करते लेकि‍न यदि‍ उन्‍हें कि‍सी दूसरी नस्‍ल वाले देश के व्‍यक्ति‍ साथ महीनों अकेले छोड़ दि‍या जाए तो उनके सोए हुए भाव कभी न कभी तो जागेंगे ही ना। खैर, एक बात तो माननी पड़ेगी की इस घटना से ब्रि‍टेन और भारत के मानस के कई पहलुओं का पता चलता है, एक तरफ़ जेड गुडी हैं तो दूसरी तरफ शि‍ल्‍पा का समर्थन करने वाले हज़ारों ब्रि‍टि‍श नागरि‍क हैं जो नस्‍लभेद का वि‍रोध करते हैं, भारत की बात करें तो एक ओर स्‍वाभावि‍क रूप से इस घटना की कड़ी निंदा करने वाला बुद्धि‍जीवी वर्ग है तो दूसरी तरफ इसे कि‍सी चर्चा या बहस का मुद्दा न मानने वाले 68 प्रति‍शत आम लोग है. इन लोगों का कहना है कि‍ जि‍स देश में गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, बेरोज़गारी, नि‍रक्षरता जैसी ज्वलंत समस्‍याएँ मौजूद हैं वहाँ वि‍देश में चल रहे कि‍सी टीवी शो में हुई कोई घटना महत्‍व नहीं रखती.
कुछ भी हो लेकि‍न शि‍ल्‍पा ने बि‍ग ब्रदर की जंग जीतकर ये साबि‍त कर दि‍या है कि‍ हम भारतीय कि‍तने धैर्यवान और क्षमाशील हैं.

अरूंधती (शि‍वानी)

न जानने के लि‍ए…..

January 20, 2007 at 11:59 am | In कवि‍ता | 6 Comments

मैं देखती हूँ
हर रोज़ उगते हुए सूरज को
जैसे बैचेन हो वो अँधेरा मि‍टाने के लि‍ए
कल इसी सूरज ने ढलते वक़्त कहा था,
मैं कल फि‍र आऊँगा तुम न भी बुलाओ तो भी,
कल भी कहाँ बुलाया था तुमने,
फि‍र भी देखो मैं आया हूँ
और मैं नि‍:स्‍तब्‍ध देखती रहती हूँ
सच है, कैसे रोक सकती हूँ मैं उसके आने
और नि‍श्चि‍त ही उसके जाने को भी

मैं देखती हूँ
हर रोज़ रात गहरे आकाश में,
टि‍मटि‍माते तारों को
जैसे वे कुछ कहना चाहते हों मुझसे
जो ज़रूरी है जीने के लि‍ए और
खुश रहने के लि‍ए भी
ऐसा कुछ जो जानती हूँ मैं
लेकि‍न समझना नहीं चाहती
या ऐसा कुछ जो
समझती हूँ मैं लेकि‍न जानना नहीं चाहती,

मैं देखती हूँ
हर रोज़ यही सब कुछ
सूरज का आना और जाना,
तारों का टि‍मटि‍माना और मुझे समझाना,
फि‍र भी मुझे ये सब,
नया लगता है,
शायद इसलि‍ए कि‍ हर दि‍न
हमारी बाकी बची ज़िंदगी का
पहला दि‍न होता है….
                                

                                                             अरुंधती अमड़ेकर (शि‍वानी)

नींद में………

January 11, 2007 at 5:14 am | In कवि‍ता | 3 Comments

कि‍तनी अच्‍छी होती है ये नींद,

इसकी गि‍रफ़्त में,

न हम, हम रहते हैं, न आप, आप,

भूल जाते हैं,

हम कौन हैं, क्‍या हैं, और क्‍यों हैं?

इसकी गि‍रफ़्त में,

न डर मौत का

न फ़ि‍क्र ज़िंदगी की,

न उलझने रास्‍तों की

और न अफ़सोस

मंज़ि‍ल तक न पहुँच पाने का,

 

भूल जाते हैं

सब कुछ, इसकी गि‍रफ़्त में,

दुश्‍मनी कि‍सी दोस्‍त की,

दोस्‍ती कि‍सी दुश्‍मन की

 

भूल जाते हैं,

दर्द, खुशी, ग़म, ज़ज़्बात, रि‍श्‍ते

और इनके जैसे कई शब्‍द जो ज़िंदगी को

जोड़ते हैं, तोड़ते हैं,

सँवारते हैं, बि‍खेरते हैं,

 

भूल जाते हैं,

इसकी गि‍रफ़्त में,

जागती आँखों से देखे सपनों को,

भूल जाते हैं

उन्‍हें पूरा करने के बोझ को,

और खो जाते हैं उन अजनबी सपनों में,

जि‍नका बरसों से कोई नाता ही नहीं रहा हमसे

फ़ि‍र भी मजबूर हैं हम,

इन्‍हें देखने और इनमें खोने के लि‍ए

इतना ही नहीं, मजबूर हैं हम

जागने और फ़ि‍र से हक़ीकत में आने के लि‍ए भी,

क्‍योंकि‍, सपने जहाँ ख़त्‍म होते हैं, हक़ीकत वहाँ से शुरू होती है,

और नींद जहाँ पर ख़त्‍म होती है, सुबह वहीं से शुरू होती है……

                                                     

 — अरुंधती अमड़ेकर  (शि‍वानी)

जय श्रीकृष्ण

January 8, 2007 at 5:14 am | In प्रवेश | 7 Comments

काग़ज कलम की सीमाओं को तोड़कर इस जाल में आए शब्‍द यात्रा के सभी यात्रि‍यों को मेरा नमस्‍कार।

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