न जानने के लि‍ए…..

January 20, 2007 at 11:59 am | Posted in कवि‍ता | 7 Comments

मैं देखती हूँ
हर रोज़ उगते हुए सूरज को
जैसे बैचेन हो वो अँधेरा मि‍टाने के लि‍ए
कल इसी सूरज ने ढलते वक़्त कहा था,
मैं कल फि‍र आऊँगा तुम न भी बुलाओ तो भी,
कल भी कहाँ बुलाया था तुमने,
फि‍र भी देखो मैं आया हूँ
और मैं नि‍:स्‍तब्‍ध देखती रहती हूँ
सच है, कैसे रोक सकती हूँ मैं उसके आने
और नि‍श्चि‍त ही उसके जाने को भी

मैं देखती हूँ
हर रोज़ रात गहरे आकाश में,
टि‍मटि‍माते तारों को
जैसे वे कुछ कहना चाहते हों मुझसे
जो ज़रूरी है जीने के लि‍ए और
खुश रहने के लि‍ए भी
ऐसा कुछ जो जानती हूँ मैं
लेकि‍न समझना नहीं चाहती
या ऐसा कुछ जो
समझती हूँ मैं लेकि‍न जानना नहीं चाहती,

मैं देखती हूँ
हर रोज़ यही सब कुछ
सूरज का आना और जाना,
तारों का टि‍मटि‍माना और मुझे समझाना,
फि‍र भी मुझे ये सब,
नया लगता है,
शायद इसलि‍ए कि‍ हर दि‍न
हमारी बाकी बची ज़िंदगी का
पहला दि‍न होता है….
                                

                                                             अरुंधती अमड़ेकर (शि‍वानी)

7 Comments »

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  1. बडी अच्छी सोच है

  2. bilkul sahi kaha aapne har roj ek naya din ek nayi shuruat…

  3. निम्न पंक्तियाँ खास पसंद आईं।

    शायद इसलि‍ए कि‍ हर दि‍न
    हमारी बाकी बची ज़िंदगी का
    पहला दि‍न होता है….

  4. सुंदर भाव. बधाई.

  5. उठ के देख बाहर जरा नई किरण नया सवेरा खिल चुका,छोड़ बीते सपने को जिसे रौंद कर यह प्रकाश फैला है…एक गतिशील कविता जिसके भाव निर्मल और चपल भी हैं…धन्यवाद

  6. बिलकुल! सूरज रोज आकर यही बताता है कि हर दिन नया सवेरा।

  7. बहुत अच्‍छा लिखती है आप…. नई रचनाओं के इंतजार में ।


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