माँ

April 2, 2007 at 5:07 am | Posted in कवि‍ता | 3 Comments

संबंध नहीं हैं माँ केवल संपर्क नहीं है
आदर्श है जीवन का केवल संबोधन नहीं है

जन्‍मदात्री है वो मात्र सहवास नहीं है
व्‍यक्तित्‍व की निर्मात्री है केवल व्‍यक्‍ति का आभास नहीं है

ममता की प्रतिमा है केवल नारी का एक रूप नहीं है
स्‍नेह की छाया है केवल कठोरता की धूप नहीं है

हृदय है इसका प्रेम का सागर, जिसकी कोई थाह नहीं है
आघातों से पीड़ित है फिर भी मुख पर आह नहीं है

आघात जो मिले है अपनो से सहने के अतिरिक्त राह नहीं है
दंडित करने की अधिकारी है मात्र क्षमा का प्रवाह नहीं है

कृतघ्न हैं वो जो माता को आहत करते हैं
कर्तव्‍यों से मुँह मोड़ अधिकारों का दावा करते हैं

संतान के रक्षण हेतु माता न जाने क्‍या क्‍या करती है
पीड़ाओं को सहकर भी आँचल की छाया देती है

कभी देवकी बनकर वो निरपराध ही दंड भोगती है
कभी अग्नि में पश्चाताप की कैकयी सी बन जलती है

सुपुत्रों से आज है मेरा नम्र निवेदन
दु:ख भी न दें उसे, यदि दे न सके सुख का आश्वासन

                                                         – अरुंधती अमड़ेकर (शिवानी)

3 Comments »

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  1. काश आपकी बात सुपुत्र लोग मानें!

  2. हाँ, माँ ऐसी ही होती है, परंतु संतान कैसी भी हो सकती है।

  3. bhut acha likha hai apne…..bhut khubsurat hai…


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