कुछ अजीब…………

March 20, 2008 at 1:57 pm | Posted in कवि‍ता | 3 Comments

अपनी परछाई को अपने अंदर देखना चाहती हूँ
शून्‍य की हर सीमा को लांघना चाहती हूँ
हर दिन को रात से शुरू करना चाहती हूँ
पता नहीं क्‍यों, पर मैं कुछ अजीब करना चाहती हूँ

जीती हुई हर बाज़ी हारना चाहती हूँ
सब कुछ पाकर फिर से खोना चाहती हूँ
शायद हर एहसास को मिटाना चाहती हूँ
पता नहीं क्‍यों, पर मैं कुछ अजीब करना चाहती हूँ

हर अंत को प्रारंभ करना चाहती हूँ
और हर आरंभ पर पराभव चाहती हूँ
शायद उसे अपनी नियति बनाना चाहती हूँ
पता नहीं क्‍यों, पर मैं कुछ अजीब करना चाहती हूँ

सब कुछ तोड़कर स्‍वयं को जोड़ना चाहती हूँ
और फिर से टूटकर बिखरना चाहती हूँ
शायद उन टुकड़ों से सिर्फ़ ख़ुद को चुनना चाहती हूँ
पता नहीं क्‍यों, पर मैं कुछ अजीब करना चाहती हूँ

————————- अरुंधती आमड़ेकर

3 Comments »

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

  1. Arundhati ji

    Aapki kavita mein ek nayee soch aur naya ‘expression’ hai.

    हर अंत को प्रारंभ करना चाहती हूँ
    और हर आरंभ पर पराभव चाहती हूँ
    शायद उसे अपनी नियति बनाना चाहती हूँ
    पता नहीं क्‍यों, पर मैं कुछ अजीब करना चाहती हूँ

    Waah !Kyaa baat hai ! Badhaayee .

    – pramod kumar kush ‘ tanha’

  2. Aapki kavita acchi lagi aisa laga jaise aapne mere soch ko kavita ke roop me likh diya ho.

  3. kuch bat hai ki hsti banti rhi hmari mita ke bhi.kau ki har sankat ek nya avsar peda krta hai


Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Blog at WordPress.com.
Entries and comments feeds.

%d bloggers like this: