November 23, 2015 at 11:40 am | Posted in चर्चा में | Leave a comment

हाल ही में पेरिस में हुए हमलों से व्‍यथित हूं..उस दिन के बाद जो चिंतन किया उसमें ये नतीजा निकला कि अब ईश्‍वर से कुछ नहीं मांगना सिर्फ ऐसे लागों के लिए सद्बुद्धि मांगना… ये लोग ऐसा क्‍यू कर रहे हैं..किसके कहने पर कर रहे हैं… इनको रोका जाना देना चाहिए…इन पर हमले होने चाहिए…देशो को एकजुट होना चाहिए… इन सब बातों का समय अब निकल चुका है। ऐसा मुझे लगता है। क्‍या ये मनुष्‍य जाति के पतन या प्रलय की शुरूवात है…अगर हां तो प्रलय का ठेका ये लोग ही क्‍याें लिए हैं…वो भी तो किसी मां के बेटे होंगे किसी बाप की आशा होंगे…किसी बहन के भाई होंगे…तो एक सामान्‍य जीवन से उन्‍हें क्‍यू परावृत्‍त किया गया.. ये लोग ईश्‍वर पर सबकुछ क्‍यों नहीं छोड़ देते..एक सामान्‍य बुद्धि तो हर व्‍यक्‍ति को होती एक अनाथ को भी जो संस्‍कार देने वाले माता पिता से वंचित होता है..तो ये लोग ही इतने वंचित क्‍यों रह गए… ऐसे किस जादू के शिकार हो गए हैं जहां इंसान होने का इल्‍म ही गायब हो गया है….

आठ वर्ष बाद

November 23, 2015 at 10:54 am | Posted in Uncategorized | Leave a comment Edit this post

आज आठ वर्ष बाद लौटी हूं। जीवन की यात्रा के विभिन्‍न पड़ावों को पार करने में शब्‍दयात्रा की गति पीछ छूट गई। ये आठ वर्ष अनुभव यात्रा की तरह थे। कितनों को खो दिया और कितनो को पा लिया इन आठ वर्षों में…देखते अब ग्रहस्‍थ जीवन की उलझनों में शब्‍दों को कितना समय दे पाती हूं ..

19 जुलाई 2011

July 19, 2011 at 12:58 pm | Posted in Uncategorized | 3 Comments Edit this post
“इंसान जितना अपने मन को मना सके उतना खुश रह सकता है।”

04 जुलाई 2011

July 4, 2011 at 5:29 am | Posted in आज का विचार | 2 Comments Edit this post
इतने मधुर न हों कि लोग आपको निगल लें, और इतने कटु भी नहीं कि वे आपको उगल दें।

16 june 2011

June 16, 2011 at 5:46 am | Posted in Uncategorized | Leave a comment Edit this post
अपनी भूल को स्वीकार करने में जो गौरव है, वह अन्याय को चिरायु रखने में नहीं।

2 जून 2011

June 2, 2011 at 8:42 am | Posted in आज का विचार | Leave a comment Edit this post
जोखिम का परिणाम भुगतना उतना कठिन नहीं होता जितना जोखिम उठाना।

तो रोना आता है…

March 11, 2011 at 12:15 pm | Posted in कवि‍ता | Leave a comment Edit this post
आँसू को कमजोरी की नि‍शानी है माना मगर

गम जब हद से गुजरने लगे तो रोना आता है

अँधेरों से लड़ने की ताकत है मुझमें मगर

दि‍न जब रात से लंबा लगे तो रोना आता है

हर दरि‍या तैर कर नि‍कल जाएँगे ये गुरूर अच्‍छा है मगर

जि‍स्‍म जब रूह से हारने लगे तो रोना आता है

अपनी कि‍स्‍मत पर इठलाना अच्‍छा लगता है मगर

दि‍माग जब दि‍ल से हारने लगे तो रोना आता है

यादों की दस्‍तक से कौन खुद को बचा पाया है मगर

कभी फलक सि‍तारों से खाली लगे तो रोना आता है

मेरे दोस्‍तों का जि‍गर बहुत बड़ा है मगर

खुद से माफी न मि‍ले तो रोना आता है

इस दुनि‍या में हाथ मि‍लाने वाले बहुत हैं

कि‍सी से दि‍ल ना मि‍ले तो रोना आता है…

 

– अरुंधती अमड़ेकर

 

11 मार्च 2011

March 11, 2011 at 12:13 pm | Posted in आज का विचार | Leave a comment Edit this post
वास्तविक महानता की उत्पत्ति स्वयं पर खामोश विजय से होती है।

तो रोना आता है…

February 25, 2011 at 12:51 pm | Posted in कवि‍ता | 1 Comment Edit this post
आँसू कमजोरी की नि‍शानी है माना मगर

गम जब हद से गुजरने लगे तो रोना आता है

अँधेरों से लड़ने की ताकत है मुझमें मगर

दि‍न जब रात से लंबा लगे तो रोना आता है

हर दरि‍या तैर कर नि‍कल जाएँगे ये गुरूर अच्‍छा है मगर

जि‍स्‍म जब रूह से हारने लगे तो रोना आता है

अपनी कि‍स्‍मत पर इठलाना अच्‍छा लगता है मगर

दि‍माग जब दि‍ल से हारने लगे तो रोना आता है

यादों की दस्‍तक से कौन खुद को बचा पाया है मगर

कभी फलक सि‍तारों से खाली लगे तो रोना आता है

मेरे दोस्‍तों का जि‍गर बहुत बड़ा है मगर

खुद से माफी न मि‍ले तो रोना आता है

इस दुनि‍या में हाथ मि‍लाने वाले बहुत हैं

कि‍सी से दि‍ल ना मि‍ले तो रोना आता है…

– अरुंधती अमड़ेकर

कुछ अजीब…………

March 20, 2008 at 1:57 pm | Posted in कवि‍ता | 3 Comments Edit this post
अपनी परछाई को अपने अंदर देखना चाहती हूँ
शून्‍य की हर सीमा को लांघना चाहती हूँ
हर दिन को रात से शुरू करना चाहती हूँ
पता नहीं क्‍यों, पर मैं कुछ अजीब करना चाहती हूँ

जीती हुई हर बाज़ी हारना चाहती हूँ
सब कुछ पाकर फिर से खोना चाहती हूँ
शायद हर एहसास को मिटाना चाहती हूँ
पता नहीं क्‍यों, पर मैं कुछ अजीब करना चाहती हूँ

हर अंत को प्रारंभ करना चाहती हूँ
और हर आरंभ पर पराभव चाहती हूँ
शायद उसे अपनी नियति बनाना चाहती हूँ
पता नहीं क्‍यों, पर मैं कुछ अजीब करना चाहती हूँ

सब कुछ तोड़कर स्‍वयं को जोड़ना चाहती हूँ
और फिर से टूटकर बिखरना चाहती हूँ
शायद उन टुकड़ों से सिर्फ़ ख़ुद को चुनना चाहती हूँ
पता नहीं क्‍यों, पर मैं कुछ अजीब करना चाहती हूँ

————————- अरुंधती आमड़ेकर

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