कुछ कही….कुछ अनकही….

लिखूं कुछ आज ये वक्त का तकाज़ा है, दिल में अभी दर्द ताज़ा-ताज़ा है, 

गिर पड़ते हैं मेरे अश्क़ क़ागज़ों पर, कलम में स्‍याही कम आंसू ज़्यादा हैं….

 

मैं लिख नहीं पाती अपने बारे में, जब कभी अपने बारे में सोचना होता है तो बस ये गाना गुनगुना लेती हूँ. लिखने कोशिश करती हूँ तो डर लगता है कहीं अपने से चोरी ना कर बैढूँ…

एक बावरा सपना….

बावरा मन…. देखने चला एक सपना
बावरे से मन की देखो बावरी हैं बातें
बावरी सी धड़कनें हैं बावरी हैं साँसें
बावरी सी करवटों से निंदिया दूर भागे
बावरे से नैन चाहे बावरे झरोखों से
बावरे नज़ारों को तकना…..
बावरे से इस जहाँ में बावरा इक साथ हो
इस सयानी भीड़ में बस हाथों में तेरा हाथ हो
बावरी सी धुन हो कोई बावरा एक राग हों
बावरे से पैर चाहे बावरे तरानों के
बावरे से बोल पे थिरकना…
बावर सा हो अँधेरा बावरी खामोशियाँ
थरथराती लौ मद्दम बावरी मदहोशियाँ
बावरा इक घूँघटा सा है हौले हौले बिन बताए
बावरे से मुखड़े से सरकना
बावरा मन देखने चला एक सपना…

5 Comments »

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  1. कुछ अपने बारे में यहाँ लिखिए।

    • this very good meter

  2. sunder

  3. Daali daali par hamne najar daali,
    kisi ne achi to kisi ne buri najar daali,,
    hamne jis daali par najar daali,
    wah dali mali ne hi kaat daali


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